मीडिया में पे कमीशन की बातें पढ़-सुन कर ऐसा लगता है कि मानो,
सभी सरकारी बाबू लोग अब मर्सिडीज़ गाड़ियों में घूमेंगे,
और निजी जेट विमानों में उडेंगे.
ताजमहल होटलों में रहेंगे,
फ्लैटों की तरफ तो वो थूकने भी नहीं जायेंगे.
हज्जार- हज्जार के लाल नोटों से नाक पोंछेंगे.
उनके बच्चे लन्दन और न्यू यार्क में पढ़ेंगे,
उनके कपड़े फैशन शो वाले लोग डिज़ाइन करेंगे,
और वो धुलने पेरिस जाया करेंगे.
उनकी जाहिल बीवियां अब सिर्फ ग्रीक और लेटिन बोलते हुए
पांच सितारा होटलों में रमी खेलेंगी,
बाबू लोग क्यूबन सिगार और पाइप पियेंगे.
उनके विदेशी कुत्तों को सैर करवाने सेठ लोग निकला करेंगे.
उनकी तनख्वाह और उनकी दफ़्तरी फ़ाइलों का हिसाब रखने को
प्राइस वाटर हाउस और KPMG में झगडे होंगे.
उनकी शामें रंगीन करने के लिए हॉलीवुड से बालाएं आयेंगी
और शाहरुख खान नाचेंगे.
मीडिया के मालिकों के विकट बुद्धिजीवियों को चिंता खाए जा रही है
की ऐसे में तो,
देश गड्ढे में जाने ही वाला है.
बहुत बुरा होने वाला है,
बाबू आपने काम से भटक जायेंगे.
हे प्रभु,
ये तू क्या करवा रहा है.
खैर बाबू, तू उदास न हो
ऊपर पढ़ और चिंतकों की मानिंद मस्त हो जा,
तेरे दिन तो अब फिरने ही वाले हैं
बस चंद दिन की ही बात है.
बस्स चंद दिन की ही तो बात है.
CARTOON, SATIRE, HUMOR, POLITICS, COMIC, LITERATURE, CARICATURE, LAMPOON, SKIT, RIDICULE, MOCKERY, SARCASTIC
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बुधवार, 6 मई 2009
बुधवार, 1 अप्रैल 2009
ओह..मैं तो सुबह सुबह ही अप्रेल फूल बन गया..
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सुबह सुबह http://tips-hindi.blogspot.com/ की पोस्ट देखी "विज्ञापन लगाइए, हिन्दी चिट्ठे से 5000 रुपए महीना कमाइए"..मुंह में लार टपक आई. और झट पट क्लिक्क किया... पर ये क्या...मैं तो अप्रेल फूल बन गया. लेकिन मुझे ये जान कर और भी ख़ुशी हुई कि मेरा नंबर ३११ है यानि मुझसे पहले ३१० दूसरे मूर्ख बन चुके थे और मेरी तरह चुपचाप अपने ज़ख्म सहला रहे थे और शुक्र मना रहे थे कि उन्हें किसी ने नहीं देखा...पर मुझे खंडेलवाल जी ने बताया है की आज शाम को वे उन सबकी लिस्ट भी प्रकाशित करने वाले हैं जिस किसी ने भी उनकी साईट पर हिट किया है...इसलिए मैं तो पकड़े जाने से पहले ही अपनी मूर्खता स्वीकार करता हूँ...-:)
बुधवार, 25 मार्च 2009
5 कार्टून देखकर वेबसाइट भी खुश हुई...वाह मोगैम्बो
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From: "Harish Krishnan"
To: kajalkumar@comic.com
CC:
Subject: Your Post has been Selected by BlogAdda for 'Tangy Tuesday'
Date: Tue, 24 Mar 2009 14:58:25 +0530
Hi Kajal,
Congratulations! Your post has been selected by BlogAdda once again as one of the top posts for this week's 'Tangy Tuesday Picks'.
BlogAdda has started 'Tangy Tuesdays' and 'Spicy Saturdays' where BlogAdda picks up good posts from Indian blogosphere and serves it to the readers on tuesdays and saturdays. This way, good posts are acknowledged and readers get to read quality content. This is also an opportunity for everyone to interact even more in fruitful discussions.
In case you would like to inform your users about your post being selected as "BlogAdda's Tangy Tuesday Pick", we have attached an image that you can use it on your post.
Thanks,
Best Regards,
Hariharakrishnan
BlogAdda.com
नैनो कार्टूनों की सराहना के लिए मैं, सभी सह ब्लागरों के साथ-साथ ब्लॉगअड्डा. कॉम का भी हार्दिक आभारी हूँ.
रविवार, 15 मार्च 2009
शनिवार, 14 मार्च 2009
रविवार, 15 फ़रवरी 2009
लेख: वैलेंटाइन की कहानी ईमेल की जुबानी..
निम्न कहानी मुझे ईमेल से मिली है. मुझे लगा कि इसे सभी के साथ बांटा जाना चाहिए..लेकिन यह अंग्रेज़ी मैं है जिसका अनुवाद मुझे नहीं आता, इसलिए ज्यूं का त्यूं लिख रहा हूँ... जो मित्र इसे मेरी ही तरह ठीक से न समझ सकें, वो बुरा न मानें, इसमें यूँ भी कोई ऐसी बात नहीं लिखी है कि कुछ तो परमाणु बोम्ब बनाना सीख जायेंगे और बाकी पीछे छूट जायेंगे...
The Gujarati Story of Valentine's Day
In spite of what you have been told by everyone, the truth is that Valentine's Day originated hundreds of years ago, in India, and to top it all, in Gujarat!!
It is a well known fact that Gujarati men, specially the Patels, continually mistreat and disrespect their wives (Patelianis). One fine day, it happened to be the 14th day of February, one brave Pateliani, having had enough "torture" by her husband, finally chose to rebel by beating him up with a Velan (rolling pin).
Yes....the same Velan which she used daily, to make chapattis for him....only this time, instead of the dough, it was the husband who was flattened. This was a momentous occasion for all Gujarati women and a revolt soon spread, like wild fire, with thousands of housewives beating up their husbands with the Velan.
There was an outburst of moaning "chapatti-ed" husbands all over Anand and Amdavad. The Patel men-folk quickly learnt their lesson and started to behave more respectfully with their Patelianis. Thereafter, on 14th February, every year, the womenfolk of Gujarat would
beat up their husbands, to commemorate that eventful day.The wives having the satisfaction of beating up their husbands with the Velan and the men having the supreme joy of submitting to the will of the women they loved. Soon The Gujju men realised that in order to avoid this ordeal they need to present gifts to their wives....they brought flowers and sweetmeats.
Hence the tradition began. As Gujarat fell under the influence of Western culture, that day was
called 'Velan time' day. The ritual soon spread to Britain and many other Western countries,
specifically, the catch words 'Velan time!'. Of course in their foreign tongues, it was first anglisised to 'Velantime' and then to 'Valentine'. And thereafter, 14th of February, came to be known as Valentine's Day!
The Gujarati Story of Valentine's Day
In spite of what you have been told by everyone, the truth is that Valentine's Day originated hundreds of years ago, in India, and to top it all, in Gujarat!!
It is a well known fact that Gujarati men, specially the Patels, continually mistreat and disrespect their wives (Patelianis). One fine day, it happened to be the 14th day of February, one brave Pateliani, having had enough "torture" by her husband, finally chose to rebel by beating him up with a Velan (rolling pin).
Yes....the same Velan which she used daily, to make chapattis for him....only this time, instead of the dough, it was the husband who was flattened. This was a momentous occasion for all Gujarati women and a revolt soon spread, like wild fire, with thousands of housewives beating up their husbands with the Velan.
There was an outburst of moaning "chapatti-ed" husbands all over Anand and Amdavad. The Patel men-folk quickly learnt their lesson and started to behave more respectfully with their Patelianis. Thereafter, on 14th February, every year, the womenfolk of Gujarat would
beat up their husbands, to commemorate that eventful day.The wives having the satisfaction of beating up their husbands with the Velan and the men having the supreme joy of submitting to the will of the women they loved. Soon The Gujju men realised that in order to avoid this ordeal they need to present gifts to their wives....they brought flowers and sweetmeats.
Hence the tradition began. As Gujarat fell under the influence of Western culture, that day was
called 'Velan time' day. The ritual soon spread to Britain and many other Western countries,
specifically, the catch words 'Velan time!'. Of course in their foreign tongues, it was first anglisised to 'Velantime' and then to 'Valentine'. And thereafter, 14th of February, came to be known as Valentine's Day!
सोमवार, 29 दिसंबर 2008
शनिवार, 27 दिसंबर 2008
मंगलवार, 23 दिसंबर 2008
अगर आपके पापा भी खो गए तो ?
टेलिविज़न पर आजकल चल रहा वह विज्ञापन आपने भी देखा होगा जिसमें एक बच्चा माँ से अपनी रिमोट वाली कार खोने की शिकायत करता है. तभी, पड़ोसी / पारिवारिक मित्र कार दिलाने की बात करता है तो बच्चा तपाक से जिस लहजे में कहता है कि 'कार आप क्यों दिलाएंगे, मेरे पापा दिलाएंगे' , सुनकर आश्चर्य हुआ कि ऐसा कौन रचनाधर्मी होगा जो बच्चे से यूँ कहलवाने का माद्दा रखता होगा .
हद तो तब हो गई जब, इसी विज्ञापन में, पड़ोसी / पारिवारिक मित्र को आगे यह कहते सुना कि 'अगर आपके पापा भी खो गए तो ?' मैं जानना चाहता था कि ऐसा विज्ञापन किसका हो सकता है जिसे न बच्चे की भावनाओं की परवाह है, न ही बात करने की तमीज.
और सच्चाई मेरे सामने थी.....यह बाबुओं की एक और सरकारी कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम का विज्ञापन था. एक करेला दूसरा नीम चढ़ा. ऐसे विज्ञापनों की परिकल्पना केवल वही सिफारिशी लोग कर सकते हैं जिनके लिए कला और काला में कोई अन्तर नहीं होता. और, निसंदेह ऐसे विज्ञापनों को केवल ऐसे बाबू लोग ही वाह-वाह करते हुए स्वीकृत कर सकते हैं जिनके लिए अपनी ओछी तथाकथित रचनात्मकता का आत्मविज्ञापन महज़ भोंडे फैशन से ज़्यादा कुछ भी नहीं होता.
हद तो तब हो गई जब, इसी विज्ञापन में, पड़ोसी / पारिवारिक मित्र को आगे यह कहते सुना कि 'अगर आपके पापा भी खो गए तो ?' मैं जानना चाहता था कि ऐसा विज्ञापन किसका हो सकता है जिसे न बच्चे की भावनाओं की परवाह है, न ही बात करने की तमीज.
और सच्चाई मेरे सामने थी.....यह बाबुओं की एक और सरकारी कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम का विज्ञापन था. एक करेला दूसरा नीम चढ़ा. ऐसे विज्ञापनों की परिकल्पना केवल वही सिफारिशी लोग कर सकते हैं जिनके लिए कला और काला में कोई अन्तर नहीं होता. और, निसंदेह ऐसे विज्ञापनों को केवल ऐसे बाबू लोग ही वाह-वाह करते हुए स्वीकृत कर सकते हैं जिनके लिए अपनी ओछी तथाकथित रचनात्मकता का आत्मविज्ञापन महज़ भोंडे फैशन से ज़्यादा कुछ भी नहीं होता.
रविवार, 21 दिसंबर 2008
ताज, ओबेरॉय और शेक्सपियर....
कभी कभी सोचता हूँ... ये सही बात है कि शेक्सपियर के पात्रों की त्रासदी बड़े लोगों की त्रासदी होती थी इसीलिए, पढ़ा-लिखा तबका उन्हें आज भी याद करता है....
मुंबई के CST, ताज, ओबेरॉय, नरीमन हाउस और टैक्सीओं में कई लोगों ने दुर्भाग्यपूर्ण घटना में जान खोई..... पर क्यों हमारी नज़र केवल ताजों के दोबारा शुरू होने पर ही जा टिकती है ?.... शेक्सपियर फिर याद आता है.
मुंबई के CST, ताज, ओबेरॉय, नरीमन हाउस और टैक्सीओं में कई लोगों ने दुर्भाग्यपूर्ण घटना में जान खोई..... पर क्यों हमारी नज़र केवल ताजों के दोबारा शुरू होने पर ही जा टिकती है ?.... शेक्सपियर फिर याद आता है.
गुरुवार, 18 दिसंबर 2008
लघुकथा : लॉंग शॉट
एक दिन, दूरदर्शन स्टूडियो के बाहर कॅमरा लगाए कोई अंदर की शूटिंग कर रहा था. मेरा आश्चर्य से फटा मुँह उसने यूँ बंद किया -' क्या बताउँ बाउजी , अनाउन्सर इतनी मोटी हो गयी है कि उसे फ्रेम में फिट करने के लिए लोंग शॉट का यही एक तरीका बचा है.'
मंगलवार, 25 नवंबर 2008
कविता: क्या मैं सही हूँ ?
सोमवार, 17 नवंबर 2008
भगवान की कविता
मंगलवार, 11 नवंबर 2008
सचिन ; ये तूने क्या कर दिया
मराठी होकर भी, सौरभ की बिदाई कमीज़ पर बांग्ला में लिख डाला? .... तुम्हें MNS से डर नहीं लगा ?
शनिवार, 8 नवंबर 2008
हिन्दी किताबें क्यों नहीं बिकतीं ? कौन जिम्मेदार ?

हिन्दी प्रकाशक-
- प्रकाशक स्वयं को लेखक और पाठक से बड़ा समझते हैं।
- प्रकाशक, प्रकाशक कम और प्रिंटर ज़्यादा हैं, बहुत कम प्रकाशक साहित्य समझते हैं।
- इन्हें चाहिए कि प्रकाशन के लिए आए साहित्य की पांडुलिपियाँ लेखक के नाम के बिना, पहले गुप्त रूप से साहित्य मर्मज्ञों को मूल्यांकन के लिए भेजें।
- प्रकाशन के लिए लेखन से ज़्यादा लेखक के नाम का महत्व है।
- प्रकाशक भी, लेखकों की ही तरह, गुटबाज़ी में मशगूल हैं।
- प्रकाशकों की धारणा है कि किताब बेचना केवल लेखक की ही ज़िम्मेदारी है, बेचारा लेखक लेखक न हुआ सेल्समैन हो गया।
- प्रकाशक मार्केटिंग के नाम पर शर्म की हद तक उदासीन रहते हैं।
- मार्केटिंग पर, अंग्रेज़ी प्रकाशक हिन्दी प्रकाशक से कहीं ज़्यादा ध्यान देता है।
- हिन्दी प्रकाशक लेखक, डिजाईन, पेपर, फोंट और प्रिंटिंग पर पाई भी ख़र्च नहीं करना चाहता।
- हिन्दी प्रकाशक विश्व प्रकाशन व्यवसाय से कुछ भी नहीं सीखना चाहता।
- ऐसे प्रकाशक स्कूलों में नियमित बिक्री-स्टाल नहीं लगाते।
- साहित्येतर प्रकाशन इनकी पहली पसंद और वरीयता हैं।
- अनुवाद को आज भी दोयम साहित्य प्रक्रिया माना जाता है।
- प्रकाशक लेखक को आदर से देखना भी हेय समझता है।
- प्रकाशक को आज भी नहीं पता कि लिटररी एजेंट किस बला का नाम है।
- प्रकाशक आज भी इस बात से अनभिज्ञ है कि इन्टरनेट को भी साहित्य के प्रसार-प्रचार के लिए प्रयोग किया जा सकता है, इन्टरनेट पर बिक्री के उद्देश्य से साहित्य प्रकाशित करना तो अभी कई दशक दूर लगता है ।
- इन्टरनेट का प्रयोग आज भी किताबों की लिस्ट तक ही सिमित है ।
हिन्दी लेखक
- गुटबाज़ी / गुरुबाज़ी फुल टाइम बिज़नेस है। गुटबाज़ी तो गाली-गलौज़ की सीमा भी लाँघ जाती है।
- ज़्यादातर लेखकों को साहित्य से भी बड़े होने का गुमान रहता है।
- नवोदित लेखक भी गुटबाज़ी को लेखन के लिए बहुत ज़रूरी समझने लगते हैं क्योंकि स्थापित लेखक उनको नितांत बुर्जुआ दृष्टि से देखते हैं न कि आदर की दृष्टि से।
- आलोचना और निंदा में अन्तर कर पाना बहुत मुश्किल दिखता है ।
- आलोचना के नाम पर बस कमियां गिनाना ही आलोचना-धर्म रह गया है इसलिए हर कोई लेखक आलोचक भी बना फिरता है।
- आलोचना के नाम पर केवल सुविधा-गुट की शान में ही क़सीदे पढ़े जाते हैं।
- समझने से पहले ही असहमत होने का मन बना बैठ जाना फै़शन हो गया है।
- पुरूस्कार का मतलब केवल "तिकड़म की विजय" रह गया है।
- दूसरी भाषाओँ और दूसरे देशों में प्रकाशन के लिए कोई प्रयास नहीं करता।
- इंटरनेट पर अपने साहित्य के प्रकाशन के नाम पर आज भी कोई पहल नहीं दिखती और सारा दारोमदार प्रकाशक पर ही समझता है।
- इलेक्ट्रोनिक मिडिया को साहित्य के लिए प्रयोग कराने में भी कोई पहल नहीं दिखती।
- दूसरी भाषाओं के साहित्य को पूरा आदर नहीं देता।
हिन्दी पाठक
- हिन्दी का पाठक और हिन्दी बोलने वाले, दो अलग श्रेणियों में विभाजित हैं ।
- हर हिन्दी बोलने वाला हिन्दी पाठक नहीं है।
- अंग्रेज़ी पाठक हिन्दी पाठक से अधिक अर्थ- संपन्न है।
- साहित्य को संस्कृति के बजाय मनोरंजन का साधन समझता है।
- ये केबल टी ० वी ० के लिए तो हर महीने ३५० रूपये देता है लेकिन साहित्य के लिए ५० रूपये की राशि भी बहुत ज़्यादा समझता है।
- "साहित्य से क्या लाभ" की प्रक्रिया निरंतर चालू है।
- साहित्य और साहित्येत्तर का अन्तर नहीं कर पाता है और आम पत्र-पत्रिकाओं को साहित्य का पर्याय मान लेता है।
- स्तरीय साहित्य-प्रकाशनों की समुचित अनुपलब्धता और उनकी असामयिक मृत्यु पाठक की स्थिति को और दुरूह बनाती हैं।
- अपने ही परिवार में साहित्य के प्रति बच्चों की रूचि जगाने के लिए कुछ भी नहीं करता इसलिए नए पाठक मिलना संयोग और भाग्य पर निर्भर करता है।
००००००००
बुधवार, 5 नवंबर 2008
मेरी मुहिम
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